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विवेकानन्द, हेडगेवार और श्रीगुरुजीविवेकानन्द के मन और हेडगेवार के प्राण का एकात्म : श्री गुरुजी आधुनिक काल में भारतीय गौरव का सिंहनाद करने, भारतीय आध्यात्मिकता को सुपरिभाषित करने और वैश्विक स्तर पर पुनर्प्रतिष्ठित करने वाले मनीषियों में स्वामी विवेकानन्द का नाम सर्वाधिक अग्रगण्य है, यह निर्विवाद है। उसी तरह यह भी निर्भ्रान्त है कि पददलित एवं आत्मविस्मृत हिन्दू जाति को सुसंगठित, शक्तिसम्पन्न और स्वाभिमान पूर्ण बनाने के लिए चिरजीवी संगठनतंत्र खड़ा करने वाले युगपुरुषों में डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार का नाम मूर्धन्य है। उनके विचारों से वैमत्य रखने वाले अनेक विचारक भी इस तथ्य पर एकमत देखे जा सकते हैं। श्री गुरुजी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर विचार करने से पूर्व यह संक्षिप्त भूमिका इसलिए उल्लेखनीय है कि गुरुजी का आमूल व्यक्तित्व और समग्र कृतित्व स्वामी विवेकानन्द के मन और डा. हेडगेवार के प्राण-इन दो महत आधारों के संश्लेषण से ऊर्जस्वित् है, इन दो मूलाग्रों से संवर्धित-पुष्पित-पल्लवित है। सर्वविदित है कि गुरुजी के नाम से विख्यात माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर जहां एक ओर डॉ. हेडगेवार से प्रेरणा ग्रहण कर रहे थे, वहीं दूसरी ओर आध्यात्मिक साधना का प्रबल आकर्षण उन्हें रामकृष्ण मठ के सारगाछी आश्रम ले गया। यहां उन्होंने रामकृष्ण परमहंस के शिष्य और स्वामी विवेकानन्द के गुरुभाई स्वामी अखंडानन्द से मंत्रदीक्षा ग्रहण की। स्वामी अखंडानन्द ने ही अपने जीवन की सांध्यवेला में श्री गुरुजी को दैन्यग्रस्त समाज की सेवा में लगने का आदेश दिया। उन्होंने गुरु-आज्ञा को शिरोधार्य कर स्वयं को पूर्णनिष्ठा के साथ शवप्रमीत पथ पर अर्पित कर दिया। विवेकानन्द के अमृतमंत्र का हेडगेवार के संगठनतंत्र मं संधारित हो जाने का नाम ही है माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर उपाख्य 'गुरुजी' हो जाना। वे समाज-साधना के धरातल पर उस प्रयागराज के समान हैं, जहाँ ज्ञानयोग और कर्मयोग की दो महती धाराएं एकाकार हो उठीं। राष्ट्र-कार्य ईश्वरीय कार्य भारत का स्वतन्त्रता आंदोलन मुख्य रूप से राजनीतिक आंदोलन था। भारत के पुनरोदय के स्वप्नदृष्टा अधिकतर राजनीति आवेष्टित थे। उनका विश्वास था कि राजनैतिक परिवर्तन सभी प्रकार के परिवर्तनों का मूल आधार है। हुआ यह कि, समाज और राष्ट्र को संचालित करने वाली वे सत्ताएं, जो राजनीति से भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण थीं, गौण होकर राजनीति की महत्ता तले दब गईं। यह प्रक्रिया भारतीय परंपरा के विपरीत थी। फलत: राजनीति जिस महत्तर सत्ता के अधीन होनी चाहिए थी, वह उलटे राजनीति की जद में आ गई। स्वतंत्रता हांसिल तो हुई किन्तु, राष्ट्रबोध, जीवनदर्शन, समाजरचना आदि जावन के प्रमुख आयामों के विषय में आमजन विचारशून्य और विचारक किंकर्तव्यविमूढ़ ही बने रहे। पराधीनता का दैन्यभाव इस कदर ग्रस्त था कि अपनी महान् परंपरा की उपेक्षा कर राष्ट्रीय पुनर्निर्माण हेतु जो कुछ वैदिशिक तत्व सुलभ हुआ, उसी का अंधानुकरण किया गया। मालिकों के महल से जो कुछ भी जुठन-चाटन, कचरा-पट्टी मिला, सब बटोर कर ले लिया गया। श्री गुरुजी की दूसरी अनुपम और महत्वपूर्ण देन इस अंधानुकरण के प्रखर प्रतिरोध की है। श्री गुरुजी स्वातंत्रोत्तर भारत के ऐसे प्रमुखतम व्यक्ति हैं जिन्होंने परकीयानुकरण के विरुध्द ''भारतीय परंपरा के समग्र'' का उद्धाटन कर, हिन्दूजीवन पध्दति की मौलिकता का दिग्दर्शन कराया। धर्म, अध्यात्म, देश, विदेश, समाजरचना, शिक्षा, अर्थनीति, संस्कृति आदि प्रत्येक जीवन से जुड़े आयामों पर भारतीय मन्तव्य उन्होंने प्रकाशित किया। गुरुजी द्वारा व्यक्तिवाद, समाजवाद, साम्यवाद, पूंजीवाद, अस्तित्ववाद, आधुनिकतावाद, मानववाद आदि तत्कालीन घटाटोप में भारतीय 'एकात्मदर्शन' का मिहिरोदय हुवा। सन् १९४७ में हमने राजनीतिक स्वतंत्रता तो हांसिल की किन्तु सांस्कृतिक रूप से हम घोर परतंत्रता में जकड़े हुए थे। श्री गुरुजी की यह अविस्मरणीय महत्ता थी कि उन्होंने इस अधूरी स्वतंत्रता को समग्र स्वतन्त्रता में बदलने की अलख जगाई। कह सकते हैं कि राजनीतिक स्वतंत्रता संग्राम के महानायक गांधीजी थे तो तद्नन्तर सांस्कृतिक स्वतंत्रता संग्राम के महानायक गुरुजी थे। राष्ट्र जीवन पर मानसिक गुलामी की काली छाया को राजनीति से परे रहकर दूर करने की साधना निश्चय ही स्वतंत्रता संग्राम का अग्रचरण था। धर्म-चिन्तन स्पष्ट है कि श्री गुरुजी के मत में व्यक्ति के धार्मिक होने का पैमाना यह नहीं कि वह कितनी बार मंदिर जाता है अथवा उसके ललाट पर तिलक की रचना कैसी है। धार्मिक होने का मापदंड यह है कि सामाजिक घटक होने के नाते अपने उत्तरदायित्व के निर्वहन की उसकी साधना कैसी है। मनु द्वारा कथित धृति, क्षमा, दम, अस्तेय, शौच, इन्द्रियनिग्रह, बुध्दि, विद्या, सत्य और अक्रोध इन धर्म के दशलक्षणों का अभ्यास कैसा है। क्योंकि इन सद्गुणों के बिना व्यष्टितत्व, समष्टि तत्व में समरस हो जाए, यह कदापि संभव नहीं। व्यष्टि-समष्टि-परमेष्टि के सहज अन्तर्संबंध का ही नाम धर्म है। विश्व हिन्दू परिषद के एक सम्मेलन में गुरुजी ने सच्चा धर्म बताते हुए कहा है कि ''कई बार लोग धार्मिक बनने का अर्थ विचित्र-सा लगा लेते हैं। वे त्रिपुंड लगाते हैं, चन्दन लगाते हैं, घंटी बजा-बजाकर लंबी-चौड़ी पूजा करते हैं, परन्तु समाज का ध्यान नहीं लगाते। यह सब धर्म नहीं, यह तो धार्मिक बनने का आभास उत्पन्न करना मात्र हुआ। हमारा सच्चा धर्म तो यही है कि यह समाज अपना है, हम सब इसका चिंतन करें और हरेक आदमी स्वभूं पोषण कर सके - ऐसा स्वाभिमान उसमें निर्माण करें। जितने दीन-दुखी मिलें, वे सब भगवान के स्वरूप हैं और इस प्रकार भगवान ने अपनी सेवा का अवसर हमें प्रदान किया है। ऐसा समझें और इस भाव से उनकी प्रत्यक्ष सेवा करने के लिए उद्यत हों।'' (श्री गुरुजी समग्र: खंड ५ - पृष्ठ १३९) विहिप की स्थापना इस प्रकार धर्म का जो स्वरूप यहाँ प्रस्तुत हुआ है, उसमें धर्म संबन्धित सभी महत्वपूर्ण बिन्दु समाविष्ट हैं। (१) समाज में सुसंगत आचार-संहिता का निर्धारण करने वाला (२) लोक का अभ्युदय करने वाला (३) समाज का आध्यात्मिक विकास करने वाला। आदर्श समाज की कल्पना को साकार करने का यह एकमेव साधन है, किन्तु इसकी कसौटी क्या है? गुरुजी कहते हैं - (१) जो समयानुकूल हो और (२) जो एकात्मभाव विकसित कर सके। आचारसंहिता जब-जब इन कसौटियों पर खरी नहीं उतरती तब-तब वे परिवर्तनाकांक्षी हो जाती हैं। वे तभी तक अपरिवर्तनीय हैं, जब तक एकात्मभाव अक्षुण्ण बना रहता है। 'धर्मादेश' में आगे जो कहा गया है, वह इस दृष्टि से निस्सन्देह प्रेरक है। ''भूतकाल में जो संहिताएं, मार्गदर्शन आवश्यक थे, किन्तु आज जो समाज हित में नहीं है उन्हें बदलना होगा। इन सब बातों का ध्यान रखकर, हम यह यंत्रणा देते हैं कि इस समाज का कोई भी वर्ग अस्पृश्य नहीं होगा, उसे कहीं भी, कभी भी, किसी भी सामाजिक कार्य में सम्मिलित होने का पूर्ण अधिकार होगा। सामाजिक अस्पृश्यता, जो भूतकाल में प्रचलित थी समूल नष्ट की जाएगी तथा जो बंधु पीड़ित थे उन्हें समान श्रेणी, आदर एवं प्रेम से प्रतिष्ठा होगी।'' कुछ मतांध लोग संघ और गुरुजी पर मनुवादी, ब्राह्मणवादी होने का आरोप मंढते रहते हैं, कहना कठिन है कि इसमें कितनी धूर्तता शामिल है और कितना भोलापन, किन्तु यह समूचा संदर्भ उनकी मिची हुई ऑंखों को खोल देने के लिए पर्याप्त है, उनके कुतर्कों का सटीक उत्तर तो है ही। हिन्दुत्व मीमांसा आधुनिक भारतीय पुनर्जागरण काल में विदेशियों के सर्वंकष वर्चस्व से आहत भारत की मनीषा ने स्वयं को सुपरिभाषित करने के लिए अपनी सनातन परंपरा के पुनरोदय के रूप में हिन्दुत्व को अधिष्ठान बनाया। इस्लाम और ईसाइयत की उन निष्ठाओं के प्रतिकार स्वरूप-उन सभी निष्ठाओं के प्रतिकार स्वरूप जिनकी भावभूमि भारत की अपेक्षा कहीं अन्यत्र जुड़ती थी - यह आग्रह पुष्ट होता गया। किन्तु स्वतंत्रता आन्दोलन में हम देखते हैं कि मुस्लिम तुष्टिकरण के वशीभूत होकर हिन्दू शब्द से परहेज किया जाने लगा, भारत के चिरंतन मानबिन्दुओं को यों कहकर तिरस्कृत किया गया, कि ये हिन्दू साम्प्रदायिकता को पुष्ट करते हैं। यहां तक की 'वंदे मातरम्' को भी कटघरे में खड़ा कर दिया गया। कुलजमा बात यह कि 'हिन्दू' शब्द को सांप्रदायिक करार देने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई। यद्यपि वास्तविकता इससे भिन्न थी। बीसवीं सदी आरम्भ होने से पहले तक हिन्दू शब्द का प्रयोग ‘भारतीय’ के अर्थ में बेझिझक किया जाता था। सन् १८८४ में लाहौर में दिये गये सर सैयद अहमद के भाषण का जिक्र स्व. हो. वे. शेषाद्रि ने अपनी प्रसिध्द पुस्तक ''और देश बंट गया'' में किया है, जिसका उल्लेख अनेक स्थानों पर हुआ है और प्राय: लोगों के ध्यान में है। यहाँ एक ऐसा प्रमाण दिया जा रहा है, जो अब तक अनुद्धाटित ही रहा है। साम्यवाद के प्रवर्तक कार्लमार्क्स ने भी हिन्दू शब्द का प्रयोग भारतीय के अर्थ में किया है। यथा - (१) 'दास केपीटल' के प्रथम खंड में, कंपनी व्यापारियों की लूट का वर्णन करते हुए मार्क्स लिखते हैं, (२) डेनियलसन के नाम ९.२.१८८१ को लिखे पत्र में, अंग्रेजों द्वारा भारत में रेल व्यवस्था कायम करने पर मार्क्स ने यह टिप्पणी की, ''लाभांश अंग्रेजों को जरूर मिलता था, लेकिन जहां तक रेलों का संबन्ध है, हिन्दुओं के लिए वह बेकार थी'' (यूजलेस टू द हिन्दूज)। (३) मार्क्स-एंगेल्स कृत, ''दॅ फर्स्ट इंडियन वार फॉर इंडिपेंडेंस'' में मार्क्स का मानना है कि ''भारत की स्वतंत्रता के दो तरीके हैं। एक, ब्रिटेन में क्रान्ति हो और सर्वहारा वर्ग सत्ता में आकर भारत को आजाद कर दें। दूसरा हिन्दू इतना शक्तिशाली हो जाये कि अंग्रेज जुआ पूरी तरह उतार फेंके।'' स्पष्ट है कि मार्क्स ने हिन्दू शब्द का प्रयोग समूचे भारतवासियों के लिए ही किया है, किसी सम्प्रदाय बोधक अर्थ में नहीं। वस्तुत: भारत को पुण्य भूमि मानने वाले वे सभी पंथ, संप्रदाय, मत 'हिन्दू' में समाविष्ट हैं जिनका मूलस्रोत भारत भूमि रही है। इतिहास साक्षी है कि यह हिन्दू सभी पंथों के प्रति समदृष्टि रखने वाला रहा है। सांप्रदायिकता इसकी मनोरचना से कभी मेल नहीं खाती। हिन्दू होने का अर्थ किसी संप्रदाय के पक्ष अथवा विपक्ष में खड़े होने से सिध्द नहीं होता, वरन् इसका कुछ विशेष अर्थ है। ऐसा अर्थ, जो विश्वभर में किसी जाति के पास नहीं है। सर्वश्रेष्ठ समाज श्री गुरुजी ने हिन्दुत्व को व्यापक अभिप्राय से जोड़ते हुए इसे इसके राजनीतिक अभिप्राय से भिन्न, एक राष्ट्रीय-सांस्कृतिक अभिप्राय से अभिषिक्त किया। हिन्दुत्व का यह सांस्कृतिक अभिप्राय ही भावात्मक ऐक्य और राष्ट्र के विकास में सक्षम है। क्योंकि यह हिन्दुत्व नकारात्मक नहीं, सकारात्मक है। द्वन्द्वात्मक नहीं, निर्द्वन्द्वात्मक है। गौरतलब है कि हिन्दुत्व का यह अभिप्राय 'हिन्दुत्व' शब्द मात्र से वृश्चिकदंश की सी पीड़ा महसूस करने वाले कुबुध्दिवादियों को तो त्याज्य है ही, कट्टर हिन्दूवाद का दंभ पालने वाले प्रतिक्रियावादियों को भी विचलित कर देता है। कार्यकर्ताओं की एक बैठक को संबोधित करते हुए श्री गुरुजी कहते हैं - ''जो अपने आप को कट्टर हिन्दू कहते हैं, उनकी भावना का भी यदि हम विश्लेषण करें तो बड़ी विचित्र स्थिति दिखाई पड़ती है। हिन्दू हमारा उपनाम मात्र बन गया है। हिन्दू याने पालिटिकल हिन्दू, मुसलमानों के खिलाफ बोलने वाला हिन्दू, ईसाईयों के विरोध में प्रचार करने वाला हिन्दू। हिन्दू का यह नकारात्मक रूप ठीक नहीं है। हिन्दुत्व की अनुभूति हमें अपनी आत्मा में होनी चाहिए। प्रतिक्रियात्मक हिन्दुत्व किसी भी काम का नहीं... मै हिन्दू हूँ, इसका अर्थ है - मेरे अंदर कुछ असामान्य गुण हैं, मेरी कुछ अलग परंपरा है, मेरे जीवन का ध्येय हिन्दुत्व के अनुरूप है। इस प्रकार हमारी धारणा भावात्मक, रचनात्मक एवं क्रियात्मक रहनी चाहिए, प्रतिक्रियात्मक कदापि नहीं।'' (श्री गुरुजी समग्र: खंड ३/ १३९) हिन्दुत्व की वास्तविक अर्थच्छवियों को उजागर करते हुए श्री गुरुजी ने प्रखरता और प्रामाणिकता के साथ जो बात प्रतिपादित की वह यह है कि, ''भारत में हिन्दुत्व ही राष्ट्रीयत्व है।'' ---------------------------------------------- |
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