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शिक्षा और संस्कारकई लोग ऐसे होते है जिन्हें धनी और किर्तिमान परिवार में जन्म लेने के कारण जन्मतः महानता का परिवेश प्राप्त होता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पिछले तीनों सरसंघचालकों के घरानों को इस प्रकार की महानता की पृष्ठभूमि प्राप्त नहीं थी। श्री गुरुजी का जन्म अत्यंत सामान्य स्थितिवाले परिवार में हुआ। श्री गुरुजी मूलतया कोंकण के गोलवली नामक गाँव के पाध्ये घराने के थे। पाध्ये अर्थात् पुरोहित व्यवसाय से सम्बद्ध। यह घराना कोंकण से प्रथम पैठण आया और बाद में नागपुर स्थानांतरित हुआ। पूजनीय श्री गुरुजी के पितामह श्री बालकृष्ण पंत नागपुर आये। इस स्थानांतरण से उनका पुरोहिती-व्यवसाय से सम्बन्ध टुट गया इसलिये गोलवलकर पाध्ये से केवल गोलवलकर उपनाम ही शेष रहा। श्री गुरुजी के पिता श्री सदाशिवराव को बचपन से ही पितृ-वियोग का आघात सहन करना पडा। अतः शिक्षा अधूरी छोडकर आजीविका चलाने के लिए उन्हें बाध्य होना जड़ा। अनेक वर्षों तक दरिद्रता में गृहस्थी चलाने की यातना का उन्हें सामना करना पड़ा। नागपुर के कामठी में ही श्री गुरुजी के पिता श्री सदाशिवराव को डाक-तार विभाग में नौकरी मिली। श्री गुरुजी की माताजी नागपुर के ही रायकर घराने की थीं, नाम था लक्ष्मीबाई। व्यवहार में श्री सदाशिवराव भाऊजी और श्रीमती लक्ष्मीबाई ताई नाम से सम्बोधित किये जाते थे। ताई- भाऊजी दम्पत्ती को कुल चार पुत्र-रत्न प्राप्त हुए। किन्तु प्रथम दो पुत्र एक-एक वर्ष की आयु में ही काल के ग्रास बने। जब तीसरा पुत्र हुआ तो उसका नाम अमृत रखा गया। किंतु अमृत भी आयु के पन्द्रहवें साल में सन्निपात का शिकार होकर काल का ग्रास बना। माता की गोद में जन्मजात प्रतिभा प्राथमिक शाला मे ही भाऊजी अपने माधव को अंग्रेजी भी सिखाने लगे थे। माधव ने इस विषय में भी इतनी शीघ्रता से प्रगति की कि जब प्राथमिक की चौथी कक्षा में थे तभी वे अपने नागपुर स्थित मामा को अंग्रेजी में पत्र लिखा करते थे। पिताजी की नौकरी हिंदीभाषी प्रदेश में थी और बार-बार स्थानांतरण के कारण रायपुर, दुर्ग, खंडवा आदि अनेक स्थानों का पानी माधव को पीने को मिला। इस अवधि में वे हिंदी भाषा से अच्छी तरह परिचित हो गये। मातृभाषा के नाते मराठी का ज्ञान तो उन्हें था ही। अनेक स्थानों पर वास्तव्य का एक परिणाम यह भी हुआ कि भिन्न-भिन्न भाषा-भाषी लोगों के सम्पर्क में वे आये। मन में संकुचितता नहीं रही और यह मानसिकता बनी कि सभी भारतीय भाषाएँ अपनी ही हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक के नाते श्री गुरुजी को जीवन भर अनगिनत, असंख्य भाषण देने पड़े। उनका वक्तृत्व अत्यंत ओजस्वी और स्फूर्तिदायक रहा करता था। इस वक्तृत्व-गुण का विकास भी शालेय जीवन से ही हुआ था। विषय की पूर्ण तैयारी कर वक्तृत्व-स्पर्धा में प्रथम क्रमांक का पुरस्कार पाने का पराक्रम भी उन्हों ने बचपन में कर दिखाया था। खूब खेलना, खूब पढ़ना, मित्रों को यथासंभव मदद करना, नम्रता बरतना, अपने जिम्मे आनेवाले घरेलू काम खुशी से करना, अन्य लोगों के सुख-दुखों से समरस होना, इस प्रकार शालेय जीवन का काल उन्होंने सार्थक कर दिखाया। भावी कर्तृत्वसम्पन्न जीवन की नींव इसी कालखंड में रखी गई। श्री गुरुजी के पिताजी ने एक बार कहा था कि माधव एक बड़ा कर्तृत्वशाली व्यक्ति बनेगा, यह तो उसके शालेय जीवन में प्रप्त उसकी गुणवत्ता से ही अनुभव होता था। किन्तु वह इतना महान् बनेगा, यह कल्पना हमने नहीं की थी। संतानों में अकेला माधव ही बचा इसका भी अब मुझे कोई दुःख नहीं रहा, क्योंकि संघ स्वयंसेवकों के रूप में हजारों बच्चे ही मानों हमें पुत्र-रूप में प्राप्त हुए हैं। यह कहते समय श्री भाऊजी के चेहरे पर अपने अलौकिक पुत्र के बारे में अभिमान प्रकट होता और नेत्र धन्यता के आँसुओं से भर आते। किन्तु यह भी ध्यान में रखना होगा कि निस्पृहता, कर्तव्यनिष्ठा, धर्मनिष्ठा, परिश्रमशीलता और ज्ञान की उपासना आदि सारे गुण जो गुरुजी में प्रकट हुए वे उनके आदर्श माता-पिता के द्वारा उन पर किये गये सुसंस्कारों के कारण ही संभव हुए थे। इसका कृतज्ञतापूर्वक उल्लेख श्री गुरुजी ने अनेक बार किया है। श्री भाऊजी की लगन और दृढ़निश्चयी वृत्ति की कल्पना एक घटना से आ सकती है। अध्यापन का व्यवसाय अपनाते समय भाऊजी ने केवल मैट्रिक की परीक्षा ही उत्तीर्ण की थी। बीच में काफी कालखंड बीत चुका था। किंतु उन्होंने स्नातक बनने की ठानी। मैट्रिक होने ते बीस साल बाद इंटरमीडिएट की परीक्षा में वे उत्तीर्ण हुए और स्नातक की उपाधि ग्रहण करने के लिए उन्हें और सात वर्ष लगे। शिक्षक की नौकरी तो उन्होंने पूर्ण जिम्मेदारी के साथ निभायी किंतु बाकी बचे समय में वे ज्ञान-दान का कार्य अविरत करते रहे। माताजी ताईजी तो निश्चय की इतनी पक्की थीं कि १९३४ में उन्होंने श्री बाबाजी महाराज नामक एक सत्पुरुष के साथ प्रयाग से आलंदी तक लगभग १ हजार मील की पदयात्रा की और त्रिवेणी संगम के पवित्र गंगाजल से संत ज्ञानेश्वर की समाधि का अभिषेक कराया। इस प्रवास में एक दुर्घटना में उनकी सारी पीठ जल जाने से दाह वेदना होती रही परन्तु उसे सहन करते हुए भी वे चलती रहीं। एक मार्मिक प्रसंग इंटरमीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण होने के बाद माधवराव जी के जीवन में एक नये और दूरगामी परिणाम वाले अध्याय का प्रारंभ हुआ। यह अध्याय बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में प्रवेश के साथ शुरू हुआ। |
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