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रामकृष्ण आश्रम से सम्पर्कनागपुर लौटने के बाद श्री गुरुजी अपने मामा श्री रायकर जी के यहाँ रहते थे और आर्थिक निर्भरता के लिए वह अपने मामा की कोचिंग क्लास में छात्रों को पढ़ाने का काम करने लगे। साथ ही साथ आप कानून की शिक्षा भी प्राप्त करने लगे और लॉ कॉलेज में प्रवेश ले लिया। सन् 1935 में उन्होंने वकालत की परीक्षा उच्च श्रेणी में उत्तीर्ण की और कुछ दिनों तक मा.स. गोलवलकर वकील इस नाम की पट्टिका भी एक मकान को सुशोभित करती रही। इसी समय गुरुजी का रामकृष्ण आश्रम से काफी सम्बन्ध बढ़ गया था। इसी समय उनके माता-पिता ने उनके विवाह के लिए अनेक बार मनाना चाहा लेकिन वह हँस कर टाल देते थे। परन्तु एक बार उन्होंने अपनी माताश्री से कह दिया, "ताई, तू मुझसे वंश खण्डित होने की बात न कह। यदि मुझ जैसे अनेकों के वंश नष्ट होकर भी समाज का कुछ भला होता हो तो वह आज की परिस्थिति में आवश्यक ही है। वंश नष्ट होने की मुझे जरा भी चिंता नहीं है।" इसके बाद माताश्री ने गुरुजी से विवाह की बात कभी नहीं की। (भिशीकर, च.प., वही, पृष्ठ 22) |
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