हिन्दूराष्ट्र-जीवन
श्रीगुरुजी (हिंदी)   27-Oct-2017
राष्ट्र के संबंध में शास्त्रीय ढंग से विचार करने वाले विद्वान् कहते हैं कि एक भूमि तथा उसके प्रति नितान्त श्रध्दा रखने वाला पुत्ररूप मनुष्य-समुदाय जब एक धर्म, संस्कृति, परम्परा, समान पूर्वज, समान आदर्श, समान सुख-दु:ख की स्मृतियाँ, एक इतिहास, अन्य लोगों के प्रति समान शत्रु-मित्र भाव, समान आशा-आकांक्षा आदि से सुसंबध्द हो अपना जीवन चलाता है, तब उसे उस भूमि के राष्ट्र की संज्ञा प्राप्त होती है। इस आधार पर भारत का राष्ट्र जीवन हिन्दू-राष्ट्र जीवन है।
 
शास्त्रीय दृष्टि से ही नहीं, ऐतिहासिक दृष्टि से भी यही बात सिध्द होती है। प्राचीनकाल में यहाँ पर हिन्दू ही रहते थे। मुसलमान, ईसाई आक्रमणकारी बनकर तथा पारसी-यहूदी अतिथि के रूप में यहाँ आए। राष्ट्र को बनाने वाले हिन्दू ही थे। इस बात का पुनरुच्चार अनजाने में अपने यहाँ के स्वतः को हिन्दू कहलाने में संकोच करने वाले बड़े-बड़े नेता भी करते हैं। सोमनाथ मंदिर के जीर्णोध्दार के समय एक नेता ने कहा था कि बारह सौ वर्षों की गुलामी का चिन्ह हमने आज मिटा डाला है। बारह वर्षो की गुलामी का तौक बांधने वाले आक्रमणकारी मुसलमान ही थे। दिसम्बर 1971 के युध्द के समय नेताओं ने कहा था कि हमारी विजय की परम्परा पांच हजार वर्ष पुरानी है। अब उस समय तो मुसलमान नहीं थे। उनका जन्म हुए भी 1971 तक चौदह सौ वर्ष पूर्ण नहीं हुए हैं। ऐसा कहा जाता है कि उनके चौदह सौ वर्ष पूर्ण होते ही वे समाप्त हो जाने वाले हैं। ईसामसीह को अभी दो हजार वर्ष भी पूरे नहीं हुए हैं। अतएव पाँच हजार वर्ष पुरानी परम्परा हिन्दुओं के सिवाय और किसकी हो सकती है।
 
हिन्दू नाम सुनकर क्षुब्ध होने वाले एक बड़े नेता से एक बार बातचीत हुई। बातचीत में मुसलमानों द्वारा देश-विभाजन के पूर्व तथा पश्चात् किए गए दंगों पर चर्चा चली, तो वे नेता एकदम आवेश में आकर बोले ''डू यू थिंक आई एम नॉट ए हिन्दू? आई एम आल सो ए हिन्दू। आई आल सो विलीव्ह इन हिन्दू नेशन।'' (अर्थात् क्या आप यह समझते हैं कि मैं हिन्दू नहीं हूँ। ध्यान रखिए मैं भी हिन्दू हूँ और हिन्दू राष्ट्र में श्रध्दा रखता हूँ)।मैंने कहा मुझे यह जानकर बड़ी प्रसन्नता हुई। आइए, अब हम दोनों सार्वजनिक मंच पर गर्जना कर यही बात जनता को बताएँ। किन्तु वे मेरी इस सलाह से सहमत नहीं हुए।
 
हमें प्रयत्नपूर्वक व्यक्ति-व्यक्ति के पास जाकर उसके अन्त:करण के सब भ्रम दूर कर, अपनी मातृभूमि का प्रेम, समाज की एकात्मता का संपूर्ण बोध तथा यह अपना हिन्दू-राष्ट्र है, इसका उद़्बोधन करते रहने की आवश्यकता है। इसके आधार पर हमें अपने समाज का शक्ति-सम्पन्न राष्ट्र जीवन खड़ा करना है।