राष्ट्र यानी समाज
श्रीगुरुजी (हिंदी)   27-Oct-2017
''यह भूमि मनुष्य के परिश्रम और पराक्रम का आधार होती है। किन्तु मनुष्य ही उसको एक आत्मतत्तव कहिये, चैतन्य कहिये, प्रदान करता है। जिस पवित्र भूमि को हम 'राष्ट्र' कहकर पुकारते हैं, उसके लिए मनुष्य ही सब कुछ होता है। किसी भी प्रकार की भौतिक स्थिति, परिस्थिति 'राष्ट्र' की रचना में पर्याप्त नहीं होती। क्योंकि 'राष्ट्र' एक आध्यात्मिक तत्व होता है- किसी भूभाग से परिच्छिन्न लोकसमूह राष्ट्र नहीं बनता।
 
“The soil provides the substratum the field for struggle and labor: man provides the soul. Man is everything in the formation of this sacred thing that we call a people. Nothing that is material suffices here. A nation is a spiritual principle; the result of the intricate workings of history: a spiritual family not a group determined by the configuration of the earth.” (Ernest Renan : What is a Nation :- Quoted in Modern Political Thought by William Ebenstein, page-764)
 
ये विचार हैं सुप्रसिध्द फ्रांसीसी विचारक अर्नेस्ट रेनॉ के। 'राष्ट्र क्या होता है' 'इस शीर्षक की अपनी पुस्तक में उसने यह लिखा है। रेनॉ आगे लिखता है ''दो बातें', जो वस्तुत: एक ही है, इस आध्यात्मिक तत्त्व को जन्म देती है। उनमें से एक वर्तमान कालीन होती है और दूसरी अतीत की। एक अतीत के अनुभवों और संस्मरणों का संग्रह होता है, तो दूसरा वर्तमान में एकत्र रहने की इच्छा होती है। हमने अतीत में यह किया और भविष्य में हम यह करेंगे – यह मान्यता जिनकी रहती है उनका राष्ट्र होता है, जिस प्रकार कृत्रिम रीति से मनुष्य तैयार नहीं किया जाता, वैसा राष्ट्र भी कृत्रिम रीति से बनाया नहीं जाता। परिश्रम, त्याग, बलिदान से राष्ट्र बनता है''
 
“A nation is a soul, a spiritual principle. Two things which are really only one go to make up this soul or spiritual principle. One of these things lies in past, the other is in present. The one is the possession in common of a rich heritage of memories; and the other is actual agreement: the desire to live together and the will to continue to make the most of the joint inheritance. Man cannot be improvised. The nation, like the individual is the fruit of a long past spent in toil, sacrifice and devotion.” ( ibid - page 765 )
 
सौ-सवासौ वर्ष पूर्व रेनॉ ने जो लिखा है और श्री गुरुजीने बार-बार जिसे कहा है उनके शब्दों में अन्तर है, किन्तु भाव एक ही है। श्री गुरुजी कहते हैं ''किसी राष्ट्र के लिए प्रथम अपरिहार्य वस्तु एक भूखण्ड है जो यथासंभव किसी प्राकृतिक सीमाओं से आबध्द हो तथा एक राष्ट्र के रहने और वृध्दि और समृध्दि के लिए आधार रूप में काम दे। द्वितीय आवश्यकता है उस विशिष्ट भूप्रदेश में रहनेवाला समाज जो उसके प्रति मातृभूमि के रूप में प्रेम और पूज्य भाव विकसित करता है तथा अपने पोषण, सुरक्षा और समृध्दि के आधार के रूप में उसे ग्रहण करता है। संक्षेप में, यह समाज उस भूमि के पुत्ररूप में स्वयं को अनुभव करे।
 
''वह समाज केवल मनुष्यों का एक समुच्चय नहीं होना चाहिए। विजातीय व्यक्तियों का किसी स्थानपर एकत्रीकरण मात्र नहीं चाहिए। उसके जीवन की एक विशिष्ट पध्दति बनी होनी चाहिए। जिसको, जीवन के आदर्श, संस्कृति, अनुभूतियों, भावनाओं, विश्वास एवं परम्पराओं के सम्मिलन के द्वारा एक स्वरूप दिया गया है। इस प्रकार जब समाज समान परम्पराओं एवं महत्तवाकाँक्षाओं से युक्त, अतीत जीवन की सुख-दु:ख की समान स्मृतियों और शत्रु-मित्र की समान अनुभूतियोंवाला तथा जिनके सभी हित संग्रहित होकर एकरूप हो गये हैं, इस सुव्यवस्थित रूप में संगठित हो जाता है, तब इस प्रकार के लोग, उस विशिष्ट प्रदेश में पुत्र के रूप में निवास करते हुए एक राष्ट्र कहे जाते हैं।''
 
''जब कभी हमने यह अनुभव किया कि हमारे हित अविभक्त हैं, हमारे शत्रु एवं मित्र हम सभी के लिए समान हैं, तो हमारे राष्ट्रजीवन में ऐसी महत शक्ति का उद्भव हुआ कि विदेशी शक्ति चूर-चूर होकर हमारे पैरोंपर लोटने लगी। एक पूर्ण राष्ट्र के निर्माण के लिए सभी आवश्यक तत्त्वों की पूर्ति इस प्रकार इस महान हिन्दुओं के जीवन में होती है। इस लिए हम कहते हैं कि हमारे इस भारत देश में हिन्दू जीवन ही राष्ट्रजीवन है। संक्षेप में यह हिन्दू राष्ट्र है।''
 
रूस के तानाशाह जोसेफ स्टालिन का एक वचन श्री गुरुजी यहाँ उध्दृत करते हैं। स्टालिन ने कहा था -''एक भू-प्रदेश मे रहने वाले जनों का, केवल आर्थिक अथवा राजनीतिक सामान्य हितों के आधार पर ही राष्ट्र नहीं बन जाता। वरन् वह तो एक अभौतिक भावनाओं की सजातीयता है।'' स्टालिन ''अभौतिक भावनाओं की सजातीयता'' कहते हैं, तो रेनॉ ''आधयात्मिक अवधारणा'' कहते हैं। तो श्री गुरुजी कहते हैं -''राष्ट्रीयता के लिए मानसिक निष्ठा एक ऐसा तत्त्व है, जिसे संम्पूर्ण संसार स्वीकार करता है।'' आगे चलकर, राष्ट्रजीवन के एकीकरण, उत्थान एवं गौरव सम्पादन करने में समर्थ शाश्वत स्रोतों की श्री गुरुजी गिनती ही करते हैं। वे कहते हैं-
 
1) ''सबसे पहला है, जिस देश को अनादि काल से हमने अपनी पवित्र मातृभूमि माना है, उसके लिए ज्वलन्त भक्तिभावना का आविर्भाव।
2) द्वितीय है, सहचर्य एवं भ्रातृत्व भावना जिसका जन्म इस अनुभूति के साथ होता है कि हम इस महान् माता के पुत्र हैं।
 
3) तृतीय है, राष्ट्र-जीवन की समान धारा की उत्कट चेतना जो समान संस्कृति एवं समान पैतृक दाय, समान इतिहास एवं समान परम्पराओं, समान आदर्शों एंव आकांक्षाओं में से उत्पन्न होती है।
 
जीवन के मूल्यों की यह त्रिगुणात्मक मूर्ति एक शब्द में हिन्दू राष्ट्रीयता है जो राष्ट्रमंदिर के निर्माण के लिए आधार बनती है।''
विचार नवनीत, पृष्ठ 119 से 132)