कार्यपध्दति
श्रीगुरुजी (हिंदी)   27-Oct-2017
1. कार्यपध्दति से शरीर, मन और बुध्दि एक ही दिशा में कार्य करने लगती हैं। इसमें से राष्ट्रभक्ति और मातृभक्ति का आविर्भाव होता है और वह संपूर्ण समाज में व्याप्त होती है। यह कार्य अत्यंत कठिन है। किंतु डॉक्टर साहब द्वारा निर्मित कार्यपध्दति उतनी ही सुगम है। इसी में उनकी अलौकिकता प्रकट हुई है।
2. पध्दति कोई भी हो, उसकी सफलता के लिये अच्छे लोग चाहिए। ऐसे लोग समाज में खड़े करने होंगे, जिनके हृदय में समाज के लिये आत्मीयता है, कल्याण है। जो समाज के दु:ख से व्यथित होते हैं, जिनके अंदर अपने स्वार्थ को नियंत्रित करने की शक्ति है और उसके लिये शारीरिक व मानसिक कष्ट उठाकर भी समाजहित के कार्य में संलग्न हैं। ऐसे सब लोगों की शक्ति समाज की आवश्यकतानुसार सूत्रबध्द ढंग से सम्पूर्ण राष्ट्र में प्रयुक्त हो सके, ऐसा अनुशासन व शिक्षा देने की व्यवस्था करना अनिवार्य है। समाज में ऐसे कार्यकर्ताओं के निर्माण का मूलगामी कार्य हम अपनी शाखाओं द्वारा कर रहे हैं। व्यक्तियों में जितना सामंजस्य उत्पन्न होगा, उतना ही प्रगति की ओर अग्रेसर होना संभव होगा। माना कि इस कार्य में समय लगेगा, परन्तु कोई तत्काल कठोर कार्यवाही से लाभ नहीं होगा। व्यक्ति की अन्त:प्रेरणा जगाकर ऐसे कार्यों के लिये प्रेरित करने का अपना यह कार्य है।
3. कार्य के दो स्वरूप हैं। एक, दैनंदिन शाखा का है। चौबीस घण्टों में हम जो कुछ संघकार्य करते हैं, उसका हिसाब-किताब करने का स्थान, संघ-स्थान है। कुछ अनुशासन आदि सीखने और एक-दूसरे के साथ कंधे से कंधा भिड़ा कर खेलने-कूदने; व्यायाम करने से समग्र समाज के सम्बन्ध में अन्त:करण में जो अभेदवृत्ति निर्माण होती है, उसे प्राप्त करने का वह स्थान है। शाखा कार्य का दूसरा हिस्सा है अतिरिक्त बचे हुए समय का उपयोग अपने चारों ओर के समाज-बंधुओं के बीच जाने के लिये करना और समाज में से व्यक्ति चुन-चुनकर अपने साथ लाने का प्रयास करना। प्रत्येक को अपने समय का उपयोग इन दोनों कार्यों के लिये करना चाहिए। लोगों के साथ निकटतम संपर्क के द्वारा आत्मीयता का वायुमण्डल बढ़ानेवाला कार्य चौबीसों घण्टे चलते रहना चाहिए। इस प्रकार से हम लोग प्रयत्न करें, तो मैं समझता हूँ कि थोड़े ही दिनों में और पर्याप्त मात्रा में ऐसी पवित्र शक्ति के रूप में हम खड़े हो जाएंगे, जिसकी आवाज समाज में सब लोग सुनते हैं। देश, राष्ट्र और समाज के हित के लिये यह आवश्यक है।
4. अपनी कार्यप्रणाली व्यक्ति के अंतकरण को विचार की मर्यादा में अवरुध्द नहीं रखती। यह व्यक्ति को श्रेष्ठता, मान-सम्मान की लालसा पैदा करनेवाली आकर्षक वस्तुओं से मुँह मोड़ना सिखाती है। समाज से एकरस, एकरूप अवस्था का, साक्षात् अनुभव दिलाकर कार्यप्रवण करती है।
5. मनुष्य कार्यपध्दति का मूल्यांकन इस कसौटी पर करता है कि वह तुरंत फलदायी है या नहीं। वह सोचता है कि वर्तमान समस्याएँ हल करने में ही कृतार्थता है। अत: कार्य की रचना ऐसी हो जिससे व्यावहारिक समस्याएँ हल करने में सफलता मिल सके। परंतु प्रश्न यह है कि क्या इन तात्कालिक समस्याओं पर ही राष्ट्र का सारा जीवन निर्भर है? भीषण गरीबी, आर्थिक विषमता आदि जो अनेक समस्याएँ सामने खड़ी हैं, उन्हें हल करने के लिये राजनैतिक शक्ति के प्रयोग और उपभोग की प्रवृत्ति पैदा होती है। ये वर्तमान समस्याएँ हल हुईं भी तो क्या राष्ट्र के सामने और समस्याएँ नहीं रहेंगी? समस्याएँ बदलेंगी, रोज नई उपाय योजना करनी पडेग़ी। परंतु प्रयत्न करने की परंपरा न हो तो वह किस प्रकार का संभव होगा? प्रयत्न करने की अविच्छिन्न परंपरा निर्माण करने के प्रयासों में ही अंतिम कल्याण है।