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आध्यात्मिक विभूति - श्री जयप्रकाश नारायणपूज्य श्रीगुरुजी तपस्वी थे। उनक संपूर्ण जीवन तपोमय था। हमारे यहाँ सब आदर्शों में बड़ा आदर्श है त्याग का आदर्श। वे तो त्याग की साक्षात् मूर्ति ही थे। पूज्य महात्मा जी और उनसे पूर्व जन्मे देश के महापुरुषें की परंपरा में ही पूज्य गुरुजी का भी जीवन था। देश की इतनी बड़ी संस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके एकमात्र नेता श्रीगुरुजी। उन्होंने सादगी का आदर्श नहीं छोड़ा, क्योंकि वे जानते थे कि सादगी का आदर्श छोड़ने का स्पष्ट अर्थ है, दूसरे सहस्रों गरीबों के मुँह की रोटी छीन लेना। मैं अत्यन्त अस्वस्थ हूँ, अभी भी मेरी साँस फूल रही है। मैं कहीं आता-जाता नहीं। फिर भी मेरे मन में पूज्य गुरुजी के लिए जो भावना है, वह ऐसी है कि उसने मुझे इस बात के लिए इजाजत नहीं दी कि मैं यहाँ आने से अपने को रोक सकूँ। गुरुजी के असामान्य व्यक्तित्व का यह प्रमाण है कि आज यहाँ भिन्न-भिन्न दल और वर्गों के लोग उपस्थित हैं। मार्क्सवादी मित्र की बात सुनकर मुझे बड़ी खुशी हुई है। प्रदेश कांग्रेस तथा कम्युनिस्ट पार्टी के किसी प्रतिनिधि का यहाँ नहीं होना, मुझे अखर रहा है। जब राष्ट्रपति श्री गिरि और प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने सबसे आगे बढ़कर अपना शोक संदेश भेजा था, तब उन्हें किसी प्रकार का संकोच नहीं होना चाहिए था। श्री पूज्य गुरुजी कर्मठता के मूर्तिमान रूप थे। कर्मठता की कमी है देश में। गुरुजी ने अपने जीवन में कर्मठता का जो आदर्श रखा है, वह अनुकरणीय है। समय-समय पर मेरा संघ के स्वयंसेवकों के साथ संबंध आता रहा है। अकाल के समय संघ के स्वयंसेवकों ने जो कार्य किया, वह 'अपूर्व' था। मैं जब भी उसका स्मरण करता हूँ, श्रध्दावनत हो जाता हूँ। श्रीगुरुजी आध्यात्मिक विभूति थे। यह एक बड़ा बोध है कि हम भारतीय हैं, हमारी हजारों वर्ष पुरानी परंपरा है, भारत का निर्माण भारतीय आधार पर ही होगा। चाहे हम कितने ही 'माडर्न' क्यों न हो जाएँ। हम अमरीकी, फ्रेंच, इंग्लिश, जर्मन नहीं कहला सकते, हम भारतीय ही रहेंगे - यह 'बोध', जिसे सहस्रों नवयुवकों में जगाया था पूज्य गुरुजी ने। मैं आशा करता हूँ कि श्री बाला साहब देवरस पूज्य गुरुजी की परंपरा को निभाएँगे। --------------------------------------------------- |
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