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द्वितीय पत्र॥ श्री ॥ मैंने तो ब्रह्मकपाल में अपना स्वत: का भी श्राध्द कर रखा है, जिससे बाद में किसी पर श्राध्दादि का बोझ न रहे। ये अति थोडे में कहा है। इसका विस्तार से अर्थ सब समझ सकेंगे यह मेरा पूरा विश्वास है। इति।
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