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तृतीय पत्र॥ श्री ॥ इस दीर्घ काल में मेरे स्वभाव-वैचित्र्य के कारण या अन्यान्य न्यूनताओं के दोषों के कारण अपने अनेक कार्यकर्ताओं को मानसिक दु:ख हुआ होगा। मैं सब से करबध्द क्षमा-याचना करता हूँ। अंत में श्रीसंत तुकारामजी का वचन उध्दृत कर रहा हूँ, जिससे सब भाव समझ में आ सकेंगे-
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श्रीगुरुजीSearchTo get updatesSign up today! |