युध्द टालने की व्यवस्थाएँ

मनुष्य-समुदायों के बीच युध्द टालने के लिए विश्व स्तर पर अनेक व्यवस्थाएँ निर्माण हुई हैं। अत: किसी देश को शक्ति-संग्रह करने की आवश्यकता नहीं है, ऐसा भी विचार सामने रखा जाता है। राष्ट्रों-राष्ट्रों के बीच के विवादों को मिटाने के लिए पहले महायुध्द के बाद विश्व के अनेक देशों ने मिलकर 'लीग ऑफ नेशन्स' की स्थापना की थी। परन्तु उसे अपने 20-22 वर्षों के अस्तित्वकाल में इस दृष्टि से सफलता नहीं मिली। वह न युध्द टाल सकी, न शांति प्रस्थापित कर सकी और न मध्यस्थता करने में ही सफल हो सकी। उसने प्रथम महायुध्द के बाद निर्माण हुए देशों की सीमाएँ निर्धारण करते हुए, राष्ट्रीय समाज और राष्ट्रीय अल्पसंख्यक कौन है, इसकी व्याख्या प्रस्तुत करने का महत्वपूर्ण कार्य किया है। अल्पसंख्यकों के अधिकार के संबंधो में भी उसने व्याख्या प्रस्तुत करने का महत्वपूर्ण कार्य किया है। अल्पसंख्यकों के अधिकारों के संबंधो में उसने जो नियम बनाए थे, वे बहुत उत्तम थे। अपना भारत देश 'लीग ऑफ नेशन्स' के मूल सदस्यों में से एक माना गया था। यदि अपने देश के नेतागण स्वतंत्रता-प्राप्ति के समय, लीग ऑफ नेशन्स के सिध्दान्तों के अनुसार अल्पसंख्यकों के प्रश्न को हल करने का प्रयत्न करते तो न देश का विभाजन होता और न उनकी उद्दंडता चल पाती। लीग ऑफ नेशन्स के प्रयासों के बावजूद दूसरा भीषण महायुध्द हुआ था। उसकी ज्वालाओं ने एशिया को भी व्याप्त किया था। उसमें जन-धन की व्यापक हानि हुई थी। फिर कुछ देशों ने भावी युध्द को रोकने की दिशा में प्रयत्न किए और यू.एन.ओ. की स्थापना की। परन्तु वह समस्या को हल करने की जिम्मेदारी नहीं लेता। आज तक उसने कहीं भी सफलतापूर्वक मध्यस्थता नहीं की है। उस संस्था के जो चार-पांच प्रमुख सदस्य हैं, जिन्हें बड़ी ताकतें कहा जाता है, वे दुनिया में अपना निजी प्रभाव बढ़ाने की दृष्टि से उस संस्था का उपयोग करते हुए दिखाई देते हैं। बड़ी ताकतों के दांव-पेंचों का वह अखाड़ा बना हुआ है। न्याय कराने, दु:ख मिटाने, साम्राज्य विस्तार तथा मानवता की हत्या रोकने में वह असफल रहा है। हमने कश्मीर का प्रश्न शांति से सुलझाने के लिए उसके सामने रखा परन्तु सुदीर्घ कालखण्ड बीत जाने पर भी न्याय नहीं मिला है और आक्रमणकारी उस प्रदेश में अपना आसन जमाए बैठा है। भारत का पक्ष न्यायपूर्ण होते हुए भी उसे न्याय नहीं मिल रहा है। 'भाग्य' ही समझिए, भारत के विरुध्द न्याय देने की निर्लज्जता अभी उसमें पैदा नहीं हुई है।

ऐसी स्थिति में क्या हम अपनी सुरक्षा तथा सम्मान को उस संस्था के भरोसे छोड़कर आश्वस्त रह सकते हैं? जो लोग कहते हैं कि जगत् में अब लड़ाई नहीं होगी, सब बातें समझौते से तय होंगी, उनका कथन सत्य प्रतीत नहीं होता। मनुष्य स्वभाव में आमूल परिवर्तन हो तो भी उसे सहस्रों वर्ष लगेंगे। आज वैसी आशा करना उचित नहीं है।