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समाज संरचना और श्रीगुरुजीअनादि काल से भारत के मन्त्रद्रष्टा मनीषियों की परम्परा में श्रीगुरुजी की समाज संरचना संबंधी अवधारणा पूर्णरूपेण वैज्ञानिक है क्योंकि वह इस मानवीय सृष्टि की रचना से पूर्ण तादात्म्ययुक्त है। पश्चिमी जगत् के वैज्ञानिकों द्वारा पृथ्वी का स्वरूप गोलाकार बताए जाने से लक्षावधि वर्ष पूर्व ही इस सनातन राष्ट्र के शास्त्रकारों ने मानवीय सृष्टि का स्वरूप मण्डलाकार घोषित किया था। उनकी इस अवधारणा की व्याख्या करते हुए श्रीगुरुजी ने कहा था कि इस राष्ट्र के मन्त्रद्रष्टा मनीषियों ने व्यक्ति को केन्द्र-बिन्दु मानकर मण्डलाकार आधार पर उसका विकास सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड तक में किया था। उनकी मान्यता थी कि मानवीय समाज की यह संरचना सृष्टि जगत् की प्रकृति से पूर्ण साम्यता रखने के कारण विघटन अथवा बिखराव के स्थान पर एकात्मता को प्रोत्साहित और पुष्ट करती है। इसका कारण यह है कि भारतीय मनीषियों की इस समाज संरचना में व्यक्ति से परिवार, वंश, ग्राम, मोहल्ला, नगर, प्रदेश, राष्ट्र, विश्व और सम्पूर्ण मानवीय सृष्टि की संरचना तक मण्डलाकार आधार पर जो विकास क्रम बताया गया है, उसमें कहीं पर भी पारस्परिक विरोध, कटुता, संघर्ष और तनाव आदि के लिए कोई स्थान इसलिए नहीं है क्योंकि इस संरचना में प्रारम्भिक केन्द्र-बिन्दु से लेकर अन्तिम छोर तक सातत्यता के आधार पर मण्डलाकार विकास होता जाता है और उसमें कहीं पर टूटन उत्पन्न नहीं होती। इस संरचना के समस्त मण्डल एक-दूसरे के पूरक और सहयोगी होते हैं और इसलिए व्यक्ति, परिवार, ग्राम, मोहल्ला, नगर, प्रदेश, राष्ट्र, विश्व, मानवता तथा सृष्टि जगत् में पारस्परिक सहकार्य बना रहता है और उसमें कहीं पर भी अन्तर्विरोध उत्पन्न नहीं होने पाता। ----------------------------------------------- |
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